शनिवार, 31 दिसंबर 2011

नए साल का शुभागमन

आज २०११ का आखिरी दिन है.साल बीता और हमने साल २०१२ के आगमन का पूरी तैयारी कर ली  है.देखा जाये तो वर्ष २०११ बहुत ही मिश्रित अनुभव वाला रहा.जहां एक तरफ विश्व में अद्भुत उथलपुथल देखने को मिला ,वही हमने कुछ महान हस्तियों को भी खो दिया,तानाशाही के अंत का भी ये वर्ष जहा गवाह रहा वही चंद लम्हों ने ख़ुशी भी दी.जहा क्रिकेट विश्व श्रृंखला में भारत का विश्व विजेता बना,वही महिला कब्बडी में विश्व पदक पर कब्ज़ा कर भारत ने खेलो को एक नए आयाम पर पहुचाया,फ़ॉर्मूला १ प्रतिस्पर्धा का आयोजन भारत में होना विश्व पटल के अमीर खेलो पर भी एक दस्तक थी .लीबिया में शुरू हुए तानाशाही के खिलाफ जंग में  वहा  की  जनता की जीत ,अमेरिका द्वारा ओसामा बिन लादेन को ढून्ढ निकालना और मौत के घाट उतार देना जहा बड़े तानाशाहों का अंतिम परिणाम था.वही सीरिया में शुरू हुए  सरकार विरोधी  अभियान,भारत में अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम,भारत और चीन के बीच सीमा विवाद,भारत का जापान के साथ अपने रिश्तो को आगे बढ़ाना तथा रूस में हिन्दुओ के पवित्र ग्रन्थ गीता पर पैदा हुए विवाद २०११ के बड़े उथलपुथल थे.वर्ष के अंत में हम श्रधांजलि देना चाहेंगे apple के स्टीव जोब्स को,साथ ही बॉलीवुड की महान हस्तियों को भी देवानंद साहब,शम्मी कपूर साहब,जगजीत सिंह जी तथा भूपेन हजारिका जी  जिनका भारतीय सिनेमा में बड़ा ही मत्वपूर्ण योगदान रहा.(साथ ही मैं श्रधांजलि देना चाहूँगा अपने प्रिय मित्र सिद्धार्थ के पिता को,जिनकी असामयिक मृत्यु हो गयी.)
कुल मिलाकर बीते वर्ष की कुछ यादे रख कर जहा हम आगे बढ़ना चाहेंगे वही कुछ ऐसे भी लम्हे हुए जिन्हें हम जरुर ही भूल जाना पसंद करेंगे.मेरी और से आपको नववर्ष की हार्दिक शुभकामना.  

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

लोकतंत्र का मखौल

लोकपाल के टलने के लिए कौन  जिम्मेदार है? सरकार या विपक्षी दल??आज एक दुसरो के ऊपर सारे  राजनितिक दल ठीकरा फोड़ते नजर आ रहे हैं. पर किसी भी बिल को पास करवाने की जिम्मेवारी सरकार की होती है ,साथ ही उसकी ही जिम्मेवारी होती है की अगर कोई बिल या कानून लाना जरुरी है तो सत्तारूढ़ दल खुद ही विपक्षी दलों को ये समझाए की  यह क्यों जरुरी है,साथ ही अगर विपक्षी दल कोई सशोधन पेश करे तो उन्हें ये भी बताया जाये की आखिर सशोधन क्यों नहीं लाया जा सकता है.विपक्षी दलों का काम है सवाल उठाना.कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह से राज्यसभा में अपरिपक्वता दिखाई,वो ये भी बता देता है कि इस बिल को लाने में उनकी भी नियत कोई साफ़ नहीं थी.मत इक्कठा करना लोकतंत्र का सबसे पहला नियम है ,क्या ये एक सोची समझी रणनीति मान लिया जाए कि जब सरकार को ये लगा कि वो अल्पमत में है उसने मतदान कि प्रक्रिया ही नहीं होने दी!!जब पूरा देश लोकपाल के लिए एकजुट था,और जनता सडको पर थी,तब इन्ही संसद के पैरोपकारो ने ये कहा था कि कानून सडको पर नहीं बनाये जाते,बल्कि कानून बनाने का अधिकार संसद का है.लेकिन पुरे देश कि जनभावना का मखौल जो इन्होने कल बनाया उसका हक इन्हें किस संविधान ने दिया ???खैर आज फिर ये भ्रष्टचार कि लड़ाई में हम ६ महीने पीछे जा चुके हैं,फिर पता नहीं दुबारा ये लौ जगाने वाला कोई और अन्ना बनना चाहेगा भी या नहीं?फिर से राष्ट्र के लिए ये भावना हममे उपजेगी या नहीं?अब सुनी आखो में दुबारा एक ही सपना पनप रहा है कि,शायद फिर से लोकतंत्र का असली महत्व हमारे वोटो से हमपर राज करने वाले ये नेता जान जाएगे,और शायद फिर से हमारे सपनो कि भ्रूण हत्या नहीं कि जाएगी.