सोमवार, 23 जनवरी 2012

भारतीय शर्म

जयपुर साहित्य उत्सव काफी जोशो-खरोश के साथ आखिरकार शुरू हो ही गया ।कई नामचीन लोगो ने इस  कार्यक्रम में शिरकत की भी की है।लेकिन इस साहित्य उत्सव में सलमान रुश्दी के आगमन को रोकने के लिए राजस्थान की राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने जिन हथकंडो को अपनाया,वो वाकई शर्मनाक है।मुस्लिम संस्था दारुलउलाम देवबंद को रुश्दी के भारत आने पर कड़ी आपत्ति थी,और उनके सामने भारत सरकार ने घुटने टेक दिए।केंद्र सरकार के आदेश ने और राज्य सरकार की मिलीभगत ने रुश्दी को अपनी मातृभूमि आने से रोक दिया।इस राजनीति से भली भांति ये जाहिर है की अल्पसंख्यको के वोट बैंक को बनाये रखने की खातिर सरकार किस हद तक जा सकती हैं।आज पूरे विश्व और भारत वर्ष में लेखको का बड़ा कुनबा सलमान को भारत नहीं आने देने के इस फैसले का विरोध कर रहा है पर लालच की पराकाष्ठा पर खड़ी केंद्र सरकार को मानो कुछ सुनाई नहीं दे रहा है।राज्य पुलिस द्वारा रुश्दी को उनकी हत्या के आशंका की मनगढ़ंत कहानी सुनाना भी सरकार कि एक सोची समझी राजनीति का ही नतीजा है।
                                               
इस देश में हर किसी को अधिकार है कि वो धरना प्रदर्शन करे,विरोध प्रकट करे परन्तु सरकार ने व्यवस्था को उसके हाल पर छोड़ कर कट्टरपंथ के आगे घुटने टेक दिए।शायद केंद्र सरकार को उनका ये फैसला सही लगे पर इस निर्णय ने निश्चित रूप भारत कि सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता को ताक पर रख दिया है।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

विवादों भरी जन्मतिथी

सेनाध्यक्ष वी के सिंह की जन्मतिथि पर उठा विवाद अब थमने की जगह और जोर पकड़ चुका है।इस मामले में  सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका दायर कर श्री सिंह भारत के पहले सेनाध्यक्ष बन चुके हैं जिसने अपने कार्यकाल के दौरान सरकार के खिलाफ कोर्ट में अर्जी दाखिल की है।सवाल यह उठता है की जन्मतिथि पर उठे इस विवाद को निपटाने का क्या सरकार के पास कोई हल नहीं था??उससे पहले सवाल यह भी उठता है कि आखिर समय रहते सरकार ने आपसी सुलह क्यों नहीं कि,जिसके फलस्वरूप सेनाध्यक्ष को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा??
                                                           
वी के सिंह कि जन्मतिथि जो उनकी मैट्रिक कि तालिका और उनके तमाम दस्तावेजो में दर्ज है वह १० मई १९५१ है,लेकिन सरकार यह दावा करती है कि सेनाध्यक्ष को दी गयी सारी पदोन्नतियां उनके जन्मतिथि का वर्ष १९५० जो कि संघ लोक सेवा आयोग में दर्ज है उसके आधार पर की गयी,सरकार का ये भी कहना है कि खुद सेनाध्यक्ष ने १९५० को अपनी जन्मतिथि स्वीकार कि थी।अब तार्किक बात यह है कि जन्मतिथि का आधार दस्तावेज होते हैं। बहरहाल सेनाध्यक्ष ने अपने आत्मसम्मान के लिए आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा ही दिया और भले ही जन्मतिथि के लिए लेकिन सरकार और सेना एक दूसरे के सामने आ ही गए। । ।  

शनिवार, 14 जनवरी 2012

पडोसी का संकट

इन दिनों पडोसी मुल्क पाकिस्तान में राजनीतिक संकट गहराता नजर आ रहा है।सनद रहे कि मेमोगेट विवाद के बाद जिस राजनीतिक अपरिपक्वता का उदाहरण पाकिस्तान सरकार ने दिया वो निस्संदेह दुर्भाग्यपूर्ण था।गत सप्ताह राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के दुबई जाने के बाद कयास लगाये जाने लगे कि पाकिस्तान कि राजनीति में एक बार फिर सेना द्वारा तख्ता पलट संभव है।हालाकि जरदारी के देश वापस लौट जाने और प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी द्वारा कि गई सुलह कि अपील ने तख्ता पलट होने कि आशंका को फिलहाल टाल दिया है,पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी पाकिस्तान सरकार अब किस बिनाह पर लोकतंत्र कि हिमायत कर रही है,ये वाकई सोचने योग्य है।
तख्ता पलट पाकिस्तान के लिए कोई नयी बात नहीं है,किन्तु पाकिस्तान की राजनीति के तीन कोण विधायिका,न्यापालिका तथा सेना के बीच बढती खाई पाकिस्तानी लोकतंत्र के लिए बहुत ही गंभीरता से सोचा जाने वाला विषय है।पकिस्तान में सेना के पास इतनी ज्यादा छूट होना और राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए सेना का उपयोग करना बहुत ही खतरनाक साबित होगा।भले ही ये पडोसी मुल्क की आंतरिक कलह हो,पर वहा की सेना के बढ़ते कदमो से भारत को अभी मुस्तैद रहने की जरुरत है।
   

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

उहापोह की स्थिति


उत्तर प्रदेश में चुनावी बिगुल बजते ही पार्टियों में घमासान शुरू हो गया है।कोई भी पार्टी किसी भी मोर्चे पर कोई भी कमजोरी नहीं रखना चाहती है।गौरतलब है कि चुनाव पूर्व चुनाव आयोग द्वारा चलाया गया डंडा कई पार्टियों के गले नहीं उतर रहा है। बसपा एक और चुनाव चिन्ह गजराज कि विशालकाय मूर्तियों को ढकने के चुनाव आयोग के  फरमान  को गलत बताने में जुटी है।वही कांग्रेस पार्टी के द्वारा मुसलमानों को चुनाव पूर्व थमाए गए आरक्षण रूपी लोलीपोप के ऊपर चुनाव आयोग कि रोक ने सत्तारूढ़ दल के होश उड़ा कर रख दिए हैं । बात-बेबात कांग्रेसी नेताओ का बयान खुद पार्टी के गले कि हड्डी बन जाता है।अपने बयान से आए दिन पार्टी को मुसीबत में डालने वाले दिग्विजय सिंह ने चुनाव प्रचार के दौरान आजमगढ़ में ये कह डाला कि बटला हाउस मुठभेड़ फर्जी था और वो चाहते हैं कि उसकी दुबारा जांच करवाई जाये।उनके इस बयान का खंडन करने खुद गृह मंत्री चिदंबरम को आना पड़ा।इस बयान ने ये सोचने को भी मजबूर कर दिया कि नेता वोट पाने कि खातिर किस हद तक जा सकते हैं!सोचने योग्य बात ये भी है कि इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान पार्टी के आतंरिक कलह को भी उजागर करती है,जहा शायद आलाकमान का कोई भी जोर नजर नहीं आता।उठा- पटक कि इस राजनीति में किस दल को जनता का कितना समर्थन मिलेगा और कौन सी पार्टी उत्तर प्रदेश के नयी तक़दीर का फैसला करेगी ये तो वक़्त ही बताएगा।वैसे चुनाव आयोग का ये चुनावी डंडा पड़ा तो जोर का ही है।