इन दिनों पडोसी मुल्क पाकिस्तान में राजनीतिक संकट गहराता नजर आ रहा है।सनद रहे कि मेमोगेट विवाद के बाद जिस राजनीतिक अपरिपक्वता का उदाहरण पाकिस्तान सरकार ने दिया वो निस्संदेह दुर्भाग्यपूर्ण था।गत सप्ताह राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के दुबई जाने के बाद कयास लगाये जाने लगे कि पाकिस्तान कि राजनीति में एक बार फिर सेना द्वारा तख्ता पलट संभव है।हालाकि जरदारी के देश वापस लौट जाने और प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी द्वारा कि गई सुलह कि अपील ने तख्ता पलट होने कि आशंका को फिलहाल टाल दिया है,पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी पाकिस्तान सरकार अब किस बिनाह पर लोकतंत्र कि हिमायत कर रही है,ये वाकई सोचने योग्य है।
तख्ता पलट पाकिस्तान के लिए कोई नयी बात नहीं है,किन्तु पाकिस्तान की राजनीति के तीन कोण विधायिका,न्यापालिका तथा सेना के बीच बढती खाई पाकिस्तानी लोकतंत्र के लिए बहुत ही गंभीरता से सोचा जाने वाला विषय है।पकिस्तान में सेना के पास इतनी ज्यादा छूट होना और राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए सेना का उपयोग करना बहुत ही खतरनाक साबित होगा।भले ही ये पडोसी मुल्क की आंतरिक कलह हो,पर वहा की सेना के बढ़ते कदमो से भारत को अभी मुस्तैद रहने की जरुरत है।
तख्ता पलट पाकिस्तान के लिए कोई नयी बात नहीं है,किन्तु पाकिस्तान की राजनीति के तीन कोण विधायिका,न्यापालिका तथा सेना के बीच बढती खाई पाकिस्तानी लोकतंत्र के लिए बहुत ही गंभीरता से सोचा जाने वाला विषय है।पकिस्तान में सेना के पास इतनी ज्यादा छूट होना और राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए सेना का उपयोग करना बहुत ही खतरनाक साबित होगा।भले ही ये पडोसी मुल्क की आंतरिक कलह हो,पर वहा की सेना के बढ़ते कदमो से भारत को अभी मुस्तैद रहने की जरुरत है।

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