बुधवार, 21 मार्च 2012

गरीबी की नयी परिभाषा

योजना आयोग एक बार फिर नए सिरे से चर्चे में है,और चर्चा का विषय है गरीबी रेखा।योजना आयोग  द्वारा पेश की गयी इस नयी रिपोर्ट के अनुसार २००४-०५ से २००९-१० के बीच में हिंदुस्तान में गरीबी घटी है तथा जिसकी वजह से अब प्रतिदिनं लगभग २९ रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है ।पहले ये सीमा ३२ रुपये निर्धारित थी।योजना आयोग के इस रिपोर्ट को लेकर विपक्ष ने खूब बवाल काटा।अपने आपको गरीबो का सर्वे-सर्वा कहने वाली ये सरकार किस आधार पर गरीबी को परिभाषित करती है,इसका तो रब ही मालिक है।एक रिक्शा चालक को प्रतिदिन अपने रिक्शा मालिक को ४० से ५० रुपये देने होते हैं,उसके बाद मुश्किल से उसकी जेब में ४०-५० रुपये बचते हैं ,जिन पैसो में बच्चे की पढाई से ले कर दवा का खर्च भी शामिल है,लेकिन सरकार की लिस्ट में वो गरीबी रेखा से बहुत ऊपर है।सरकार ये दावा करती है कि शिक्षा और इलाज गरीबो के लिए मुफ्त मुहैया करवाया जाता है,लेकिन शायद ये भूल जाती है कि जमीनी सच्चाई क्या है,अस्पतालों में दवा नहीं है ,स्कूलों में शिक्षक नहीं है, पर इस सरकार के लिए गरीब ही नहीं है!!हांलाकि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया ने कहा है कि इससे गरीबी रेखा पर कोई असर नहीं पड़ेगा,लेकिन 2g , कॉमन वेल्थ गेम ,काले धन के मामले से घिरे रहने वाली इस सरकार से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है ??बहरहाल गरीबो को ये वास्तविकता समझ लेनी चाहिए कि हिन्दुस्तान जैसे देश में उन्हें अपने आप को गरीब समझने कि कोई जरुरत नहीं है !!!!!

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